Ym ditiya ki katha, यम द्वितीया की कथा, चित्रगुप्त की कथा

 18 चित्रगुप्त की कथा


 यमद्वितीया की कथा


 अर्थात्


 चित्रगुप्त की कथा


 ॥ दोहा ॥


 मंत्री श्री धर्मराजस्य चित्रगुप्तः शुभंकरः । पायान्मां सर्वपापेभ्यः शरणागत वत्सलः ॥


 एक बार युधिष्ठिर भीष्म जी से बोले- है पितामह! आपकी कृपा मैंने धर्मशास्त्र सुनें। परंतु इस यमद्वितीया का क्या पुण्य है, क्या फल है? यह मैं सुनना चाहता हूँ। आप कृपा करके मुझे विस्तारपूर्वक कहिए। भीष्म जी बोले- तूने अच्छी बात पूछी। मैं उस उत्तम व्रत को विस्तारपूर्वक बताता हूँ-


 कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष और चैत्र के कृष्ण पक्ष की जो द्वितीया होती है, वह यमद्वितीया कहलाती है। युधिष्ठिर जी बोले-उस कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया में किसका पूजन करना चाहिए और चैत्र महीने में यह व्रत कैसे


19/ बैकुण्ठ चतुर्दशी एवं द्वितीय कथाएँ


 हो, इसमें किसका पूजन करें? भीष्म जी बोले- हे युधिष्ठिर! मैं पुराण संबंधी कथा सुनाता हूँ।


 इसमें संशय नहीं कि इस कथा को सुनकर प्राणी सब पापों से छूट जाता है। सतयुग में नारायण भगवान् से जिनकी नाभि में कमल है उससे चार मुँह वाले ब्रह्मा जी पैदा हुए जिनसे वेदवेत्ता भगवान् ने चारों वेद कहे। नारायण बोले- हे ब्रह्मा जी ! आप सब की तुरीय अवस्था, रूप और योगियों की गति हो, मेरी आज्ञा से सब जगत को शीघ्र रचो। ऐसे श्री हरि के वचन सुनकर हर्ष से प्रफुल्लित हुए ब्रह्मा जी ने अपने मुख से ब्राह्मणों को, बाहुओं से क्षत्रियों को, जंघाओं से वैश्यों को और पैरों से शूद्रों को उत्पन्न किया। इसके बाद देव, गंधर्व, दानव, राक्षस, सर्प, नाग, जल के जीव, स्थल के जीव, नदी, पर्वत और वृक्ष आदि को पैदा कर मनुजी को पैदा किया।


 इसके बाद दक्ष प्रजापति जी को पैदा किया और उनसे आगे और सृष्टि उत्पन्न करने को कहा। दक्ष प्रजापति जी से ६० कन्या उत्पन्न हुई। जिनमें से १० धर्मराज को, १३ कश्यप को और २७


20/ चित्रगुप्त की कथा


 चंद्रमा की दीं। कश्यप जी से देव, दानव, राक्षस, पिशाच, गौ और पक्षियों की जातियाँ पैदा हुई।


 धर्मराज को धर्म प्रधान जानकर सबके पितामह ब्रह्मा जी ने उन्हें सब लोकों का अधिकार दिया और धर्मराज से कहा कि तुम आलस्य त्याग कर कर्म करो। जीवों ने जैसे-जैसे शुभ व अशुभ कर्म किए हैं, उसी प्रकार न्याय पूर्वक वेद शास्त्र में कही विधि के अनुसार कर्त्ता को कर्म का फल दो और सदा मेरी आज्ञा का पालन करो। ब्रह्मा जी की यह आज्ञा सुनकर बुद्धिमान धर्मराज ने हाथ जोड़कर सबके परम् पूज्य ब्रह्मा जी को कहा- हे प्रभो! मैं आपका सेवक निवेदन करता हूँ इस सारे जगत के कर्मों का विभाग पूर्वक फल देने की जो आपने मुझे आज्ञा दी है यह एक महान् कर्म है। आपकी आज्ञा शिरोधार्य कर मैं यह काम करूँगा जिससे कर्त्ताओं को कर्मानुसार फल मिलेगा। परंतु पूरी सृष्टि में जीव और उनके देह भी अनंत हैं। देशकाल ज्ञात-अज्ञात आदि भेदों से कर्म भी अनंत हैं। उनमें कर्त्ता ने कितने किए, कितने भोगे, कितने शेष हैं और कैसा उनका


21/ बैकुण्ठ चतुर्दशी एवं यमद्वितीया कथा


 भोग है तथा इन कर्मों के भी मुख्य व गौण भेद से अनेक हो जाते हैं एवं कर्त्ता ने कैसे किया, स्वयं किया या दूसरे की प्रेरणा से किया आदि कर्म चक्र महागहन है। अतः मैं अकेला किस प्रकार इस भार को उठा सकूँगा ? इसीलिए मुझे कोई ऐसा सहायक दीजिए जो धार्मिक, न्यायी, बुद्धिमान, शीघ्रकारी, लेखकर्म विज्ञ, चमत्कारी, तपस्वी, ब्रह्म निष्ठ और वेद शास्त्र का ज्ञाता हो।


 धर्मराज की इस प्रकार प्रार्थना पूर्वक किए हुए कथन को विधाता सत्य जान मन में अति प्रसन्न हुए और यमराज का मनोरथ पूर्ण करने की चिंता करने लगे कि उक्त सब गुणों वाला लेखक पुरुष कौन होना चाहिए। उसके बिना धर्मराज का मनोरथ पूर्ण न होगा। तब ब्रह्मा जी ने कहा- हे धर्मराज! तुम्हारे अधिकार में मैं सहायता करूँगा । इतना कह ब्रह्मा जी ध्यानमग्न हो गए।


 उसी अवस्था में उन्होंने एक हज़ार वर्ष तक तपस्या की। जब समाधि खुली तब अपने सामने श्याम रंग, कमल नयन, शंख की सी गर्दन, गूढ़


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 शिर, चंद्रमा के मुख वाले, कलम, दयान और पानी हाथ में लिए हुए, महाबुद्धि, देवताओं का मान बढ़ाने वाला, धर्माधर्म के विचार में महाप्रवीण लेखक, कर्म में महाचतुर पुरुष को देख उससे पूछा कि तू कौन है? तब उसने कहा- हे प्रभु मैं माता-पिता को तो नहीं जानता किंतु आपके शरीर से प्रकट हुआ हूँ, इसलिए मेरा नामकरण कीजिए और कहिए कि मैं क्या करूँ?


 ब्रह्मा जी ने उस पुरुष के वचन सुन अपने हृदय से उत्पन्न हुए उस पुरुष को हँस कर कहा- तू मेरी काया से प्रकट हुआ है। इससे मेरे काया शरीर में तुम्हारी स्थिति है, इसलिए तुम्हारा नाम कायस्थ चित्रगुप्त है। धर्मराज के पुर में प्राणियों के शुभाशुभ कर्म लिखने में तू उसका सखा बने, इसलिए तेरी उत्पत्ति हुई है। ब्रह्मा जी ने चित्रगुप्त से यह कहकर धर्मराज से कहा- हे धर्मराज! यह उत्तम लेखक तुझको मैंन दिया है। जो संसार में सब कर्म सूत्र की मर्यादा पालन करने के लिए


 है। इतना कहकर ब्रह्मा जी अंतर्ध्यान हो गए। फिर चित्रगुप्त कोटिनगर में जाकर चण्ड-



21 बैकुण्ठ चतुर्दशी एवं यमद्वितीया कथाएँ


 प्रचण्ड ज्वालामुखी काली जी के पूजन में लग गया। उपवास कर उसने भक्ति के साथ चण्डिका जी की भावना मन में की। उसने उत्तमता से चित्त लगाकर ज्वालामुखी देवी जी का जप और स्तोत्रों से भजन-पूजन और उपासना इस प्रकार की-


 हे जगत को धारण करने वाली! तुमको नमस्कार है, महादेवी! तुम्हें नमस्कार है। स्वर्ग, मृत्यु, पाताल आदि लोक लोकांतरों को रोशनी देनी वाली तुमको नमस्कार है। संध्या और रात्रि रूप भगवती तुमको नमस्कार है। श्वेत वस्त्र धारण करने वाली सरस्वती तुमको नमस्कार है। सत, रज, तमोगुण रूप देवगणों को कान्ति देने वाली देवी, हिमाचल पर्वत पर स्थापित आदिशक्ति चण्डी देवी तुमको नमस्कार है।


 उत्तम और न्यून गुणों से रहित वेद की प्रवृति करने वाली, तैंतीस कोटि देवताओं को प्रकट करने वाली त्रिगुणरूप, निर्गुण, गुण रहित, गुणों से परे, गुणों को देने वाली, तीन नेत्रों वाली, तीन प्रकार की मूर्ति वाली, साधकों को वर देने वाली , दैत्यों का नाश करने वाली, इन्द्रादि देवों




24 चित्रगुप्त की कथा


 को राज्य देने वाली, श्री हरि से पूजित देवी है चण्डिके ! आप इन्द्रादि देवों को जैसे वरदान देती हैं वैसे ही मुझको वरदान दीजिए। मैंने लोकों के अधिकार के लिए आपकी स्तुति की है इसमें संशय नहीं है।


 ऐसी स्तुति को सुन देवी ने चित्रगुप्त जी को वर दिया। देवी जी बोलीं- हे चित्रगुप्त ! तूने मेरी आराधन पूजन किया इससे मैंने आज तुमको वर दिया कि तू परोपकार में कुशल अपने अधिकार में सदा स्थिर और असंख्य वर्षों की आयु वाला होगा। यह वर देकर दुर्गा देवीजी अन्तर्ध्यान हो गईं। उसके बाद चित्रगुप्त धर्मराज के साथ उनके स्थान पर गए और वह आराधना करने योग्य अपने आसन पर स्थित हुए। उसी समय ऋषियों में उत्तम ऋषि सुशर्मा ने जिसको सन्तान की चाहना थी उसने ब्रह्मा जी की आराधन की। तब ब्रह्मा जी ने प्रसन्नता से उसकी इरावती नाम की कन्या को पाकर चित्रगुप्त के साथ उसका विवाह किया। उस कन्या से चित्रगुप्त के आठ पुत्र उत्पन्न हुए जिनके नाम इस प्रकार हैं- चारु, सुचारु, चित्र, मतिमान,


25/ बैकुण्ठ चतुर्दशी एवं यमद्वितीया कथाएँ


 हिमवान, चित्रचारु, अरुण और अतीन्द्रिय । दूसरी जो मनु की कन्या दक्षिणा चित्रगुप्त से विवाही गई उसके चार पुत्र हुए। उनके नाम हैं- भानु, विभानु, विश्वभानु, और वीर्य्यवान्। चित्रगुप्त के ये बारह पुत्र विख्यात हुए और पृथ्वी तल पर विचरे। उनमें से चारु जी मथुरा को गए और वहाँ रहने से माथुर हुए। हे राजन्! सुचारु गौड़ बंगाल को गए, इससे वह गौड़ हुए। चित्रभट्ट नदी के पास के नगर को गए, इससे वह भट्टनागर कहलाए। श्रीवास नगर में भानु बसे, इससे वह श्रीवास्तव कहलाए। हिमवान अम्बा दुर्गाजी की आराधन कर अम्बा नगर में ठहरे इससे वह अम्बष्ट कहलाए। सखसेन नगर में अपनी भार्या के मतिमान गए इससे वह सूर्यध्वज कहलाए और अनेक स्थानों में बसे अनेक जाति कहलाए।


 उस समय पृथ्वी पर एक राजा जिसका नाम सौदास था, सौराष्ट्र नगर में उत्पन्न हुआ। वह महापापी, पराया धन चुराने वाला, पराई स्त्रियों से आसक्त, महाअभिमानी, चुगल खोर और पाप कर्म करने वाला था। हे राजन्! जन्म से लेकर


26/ चित्रगुप्त की कथा


 सारी आयु पर्यन्त उसने कुछ भी धर्म नहीं किया। किसी समय वह राजा अपनी सेना लेकर वन में जहाँ बहुत हिरण आदि जीव रहते थे शिकार करने को गया । वहाँ उसने निरन्तर व्रत करते हुए एक ब्राह्मण को देखा। वह ब्राह्मण चित्रगुप्त और यमराज जी का पूजन कर रहा था। यमद्वितीया का दिन था। राजा ने पूछा- महाराज! आप क्या कर रहे हैं? ब्राह्मण ने यमद्वितीया व्रत कह सुनाया। यह सुनकर राजा ने वहीं उसी दिन कार्तिक के महिने में शुक्ल पक्ष की द्वितीया को धूप तथा दीपादि सामग्री से चित्रगुप्त जी के साथ धर्मराज जी का पूजन किया। व्रत करने के बाद वह अपने घर में आया। कुछ दिन पीछे उसके मन को विस्मरण हुआ और वह व्रत भूल गया। याद आने पर उसने फिर से व्रत किया।


 समयोपरान्त काल संयोग से वह राजा सौदास मर गया। यमदूतों ने उसे दृढ़ता से बाँधकर यमराज जी के पास पहुँचाया। यमराज जी ने उस घबराये हुए मन वाले राजा को अपने दूतों से पिटते हुए देखा तो चित्रगुप्त से पूछा कि इस राजा ने क्या


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 कर्म किया? उस समय धर्मराज जी का वचन सुन चित्रगुप्त बोले- इसने बहुत ही दुष्कर्म किए हैं। परन्तु दैवयोग से एक व्रत किया जो कार्तिक के शुक्ल पक्ष में यमद्वितीया होती है उस दिन आपका और मेरा गन्ध, चन्दन, फूल आदि सामग्री से एक बार भोजन के नियम से और रात्रि में जागकर पूजन किया। हे देव! हे महाराज! इस कारण से यह राजा नर्क में डालने योग्य नहीं है। चित्रगुप्त जी के ऐसा कहने से धर्मराज जी ने उसे छुड़ा दिया और वह इस यमद्वितीया के व्रत के प्रभाव से उत्तम गति को प्राप्त हुआ।


 ऐसा सुनकर राजा युधिष्ठिर जी भीष्म पितामह से बोले - हे पितामह! इस व्रत को मनुष्यों को धर्मराज और चित्रगुप्त जी का पूजन कैसे करना चाहिए? सो मुझे कहिए। भीष्म जी बोले- यमद्वितीया के विधान को सुनो।


 एक पवित्र स्थान पर धर्मराज और चित्रगुप्त जी की मूर्ति स्थापित कर उनकी पूजा की कल्पना करें। वहाँ उन दोनों की प्रतिष्ठा कर १६ प्रकार की व ५ प्रकार की सामग्री से श्रद्धा भक्ति युक्त



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 नाना प्रकार के पकवानों, लड्डुओं, फल, फूल, पान तथा दक्षिणादि सामग्रियों से धर्मराज जी और चित्रगुप्त जी का पूजन करना चाहिए। पीछे बारम्बार नमस्कार करें। हे धर्मराज जी! आपको नमस्कार है। हे चित्रगुप्त जी! आपको नमस्कार है। मुझे पुत्र दीजिए, धन दीजिए, सब मनोरथों को पूरा कर दीजिए ।


 इस प्रकार चित्रगुप्त जी के साथ धर्मराज जी का पूजन कर विधि-पूर्वक दवात और कलम की पूजा करें। चन्दन, कपूर, अगर और नैवेद्य, पान, दक्षिणादि सामग्रियों से पूजन करें और कथा सुनें। बहिन के घर भोजन कर उसके लिए धन आदि पदार्थ दें। इस प्रकार भक्ति के साथ यमद्वितीया का व्रत करने वाला पुत्रों से युक्त होता है और मनोवांछित फलों को पाता है।



































































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