13 श्री की
उद्यापन विधि
श्री धर्मराज महाराज की कथा और उपासना का एक वर्ष पूर्ण हो जाए तो मकर संक्रान्ति के दिन इस व्रत कथा का उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन की संक्षिप्त विधि इस प्रकार है-अपने घर में सुन्दर मण्डप बनाएं, जिसमें चार स्तम्भ हों। मण्डप और घर को सुन्दर वस्त्र, पुष्प एवं हरे पत्तों से सजाएँ।
मण्डप के भीतर श्री धर्मराज जी एवं चित्रगुप्त जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उसके सामने आचार्य द्वारा सर्वतोभद्रमण्डल स्थापित कराएँ। भद्रमण्डल से बाई ओर नवग्रह तथा दाहिनी तरफ षोडषमातृका की स्थापना करें। मातृका के समीप गणेश तथा ईशान कोण में रुद्र कलश स्थापित कर उस पर यथा शक्ति स्वर्ण या चाँदी की धर्मराज की मूर्ति स्थापित करें। तदन्तर सभी देवताओं का पूजन करें और प्रधान देव के रूप में श्री धर्मराज जी महाराज का विनम्रभाव से श्रद्धा युक्त षोडषोपचार से पूजन करें। होकर
13 बैकुण्ठ चतुर्दशी एवं द्वितीय
आचार्य द्वारा गणेश गौरी नवग्रह के निमित्त 'हेवन और ग्रह शान्ति करा के श्री धर्मराज के निमित्त आहुति निम्नलिखित मन्त्रों से देनी चाहिए-
१. ॐ यमाय नमः स्वाहा।
२. ॐ धर्मराजाय नमः स्वाहा।
३. ॐ मृत्यवे नमः स्वाहा।
४. ॐ अन्तकाय नमः स्वाहा।
ॐ वैवस्वताय नमः स्वाहा। ५. ६. ॐ कालाय नमः स्वाहा।
७. ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः स्वाहा।
८. ॐ औदुम्बराय नमः स्वाहा।
९. ॐ दघ्नाय नमः स्वाहा।
१०. ॐ नीलाय नमः स्वाहा। ११. ॐ परमेष्ठिते नमः स्वाहा।
१२. ॐ वृकोदराय नमः स्वाहा।
१३. ॐ चित्राय नमः स्वाहा।
१४. ॐ चित्रगुप्ताय नमः स्वाहा।
इन मन्त्राहुतियों की ५, ७ या १४ आवृत्ति करें। खीर या मावे से लक्ष्मी होम करें। पंचलोकपाल और दशदिक्पाल की पूजा कर पूर्णाहुति करें।
14/ श्री धर्मराज जी की कथा
हवन के बाद ब्राह्मण सहित चौदह दम्पत्ति (पति-पत्नि) को भोजन कराएँ एवं चौदह पात्र (बर्तन) लाकर प्रत्येक दम्पत्ति को एक-एक पात्र अपर्ण करें एवं दक्षिणा देकर विदा करें। आचार्य को धर्मराज की स्वर्ण या चाँदी की प्रतिमा या गौ, अन्न, वस्त्रादिक देकर अभिवादन करें।
तत्पश्चात् उपवास (एक समय भोजन) करते हुए अपने बंधु-बांधवों को भी भोजन कराएँ। इस कार्य के एक दिन पहले रात्रि को अर्थात् मकर संक्रान्ति से एक दिन पूर्व श्री धर्मराज की कथा-संकीर्तन एवं रात्रि जागरण का भी विधान कहा गया है। जो मनुष्य इस प्रकार व्रत कथा का उद्यापन करता है उसे कथा के पूर्ण फल की प्राप्ति होती है और भगवान् धर्मराज उस प्राणी पर प्रसन्न होकर सदैव उसकी रक्षा करते हैं। वह मनुष्य धर्मराज की कृपा से दीर्घायु प्राप्त करता है। इस लोक में वह सुख से पुत्र-पौत्रों सहित जीवनयापन करके और समस्त पापों से मुक्त होकर नरक की यातनाओं से बचकर बैकुण्ठ लोक को प्राप्त करता है।
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