Shri dhram raj ji ki katha, बैकुंठ चतुर्दशी व्रत कथा, श्री धर्म राज जी की कथा

 3/ wph and w


 बैकुण्ठ चतुर्दशी व्रत कथा श्री धर्मराज जी की कथा


 अर्थात्


 ॥ दोहा ॥


 श्री गुरु पद वन्दन करूँ मैं श्री हरि चरण चित्त धार धर्मराज की शुभ कथा का करूँ आज विस्तार ॥ प्राणिन को फल देत है जो पाप पुण्य अनुसार। उनकी कथा अनूप यह शुभ मंगल ही परिवार ||


 एक समय नैमिवारण्य तीर्थ में शौनकादिक अट्ठासी हज़ार ऋषिगण इकट्ठे होकर सबकी भलाई के लिए विचार कर रहे थे कि श्री सूत जी महाराज भी वहाँ पधारे। श्री सूत जी महाराज को आते देखकर सारे ऋषिगण आदर से उठ खड़े हुए तथा उन्हें बड़े ही सत्कार के साथ लाकर सबसे ऊँचे आसन पर बैठाया, इसके पश्चात् उनसे कई प्रकार की जनकल्याण की बातें पूछने लगे। श्री शौनक ऋषि बोले- हे सूत जी महाराज! कृपा करके आज आप हमें भी धर्मराज की कथा



6


 तथा साथ ही उसका विधि-विधान और महा भी कहिए और बताइए कि इस कथा को क सुनने से क्या लाभ मिलता है?


 यह सुनकर सूत जी बोले- हे ऋषियों आपने जो जनकल्याण की भावना से यह बात मुझसे पूछी है, यह कलियुग में बहुत ही फलदायी है। इसको संक्षेप में मैं आप लोगों से कहता हूँ-


 हे ऋषियों! सतयुग के बीत जाने पर तथा त्रेतायुग के प्रारम्भ में महोदपुर नाम का विशाल नगर था, जहाँ बभ्रुवाहन नाम का राजा राज्य करता था। वह बड़ा ही दयालु प्रजापालक, परोपकारी और गौ ब्राह्मण की सेवा करने वाला था। एक बार वह वन में आखेट करने गया तो उसने वहाँ एक ऐसा हिरन देखा जैसा पहले कभी भी देखने में न आया था। राजा ने ऐसे सुन्दर, मनोहारी मृग को मारना उचित नहीं समझा और बिना शिकार किए ही कुछ सोचते हुए वापिस घर लौट पड़ा। मार्ग में उसे एक ब्राह्मण कन्या मिली जो ईश्वर की आराधना में लीन थी। उसे देखकर राजा रुक गया और उससे पूछने लगा-


हे कन्या! तू इस प्रकार अकेली इस में आराधना क्यों कर रही है? तो वह बोली कि है राजन्! मैं सुयोग्य वर तथा सुख की प्राप्ति के लिए ऐसा कर रही हूँ। राजा ने उसका रथ जानकर ईश्वरीय प्रेरणा से हरिदास नाम के एक महा विद्वान के साथ उसका विवाह करवा दिया और खूब धन सम्पदा देकर विदा किया।


 वह विप्र कन्या गुणवती ऐसे विद्वान पति की पाकर आनन्दपूर्वक रहने लगी। हरिदास ने भी गुणवती की प्रायः सभी देवताओं की भक्ति तथा आराधना के मार्ग बतलाए पर एक धर्मराज की आराधना एवं भक्ति का मार्ग नहीं बतलाया।


 सम्पूर्ण आयु सुख से व्यतीत कर जब वृद्ध होकर गुणवती के प्राण छूटे तब धर्मराज के दून उसके प्राणों को धर्मराज के सम्मुख ले गए। गुणवती ने वहाँ देखा कि धर्मराज की पूरी सर्व धातुओं के परकोटे से घिरी हुई है और उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ और बड़े-बड़े दरवाज़े बने हुए हैं। जिसमें से पूर्व के दरवाजे में सोने की, उत्तर के दरवाजे में हीरे पन्नों की,


6 श्री धर्मराज जी की कथा


पश्चिम के दरवाज़े में चाँदी की तथा दक्षिण के दरवाज़े पर सर्व धातु की निसैनियाँ लगी हुई हैं। उसे देख गुणवती ने बड़े ही कष्ट से निसैनी पर चढ़कर धर्मराज के पुर में प्रवेश किया। वहाँ उसने अत्यन्त मनोहर धर्मराज के मन्दिर और वहाँ के विशाल ठाट-बाट को देखा। इसके बाद दूत उसे धर्मराज के सम्मुख ले गए जो एक विशाल रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान थे। जहाँ बैठकर वह प्राणियों का लेखा-जोखा ले रहे थे।


गुणवती धर्मराज के विशाल तथा तेजस्वी रूप और उनके भयानक दूतों को देखकर भयभीत हो उठी और काँपने लगी। कई प्राणियों का लेखा- देख लेने के पश्चात् जब धर्मराज ने गुणवती के पाप-पुण्यों का लेखा देखा तो यह देखकर कि उसने अन्य सभी देवताओं को तो उनकी भक्ति करके प्रसन्न किया है, पर धर्मराज की भक्ति बिल्कुल भी नहीं की है, इससे वे कुछ-कुछ अप्रसन्न हुए।


धर्मराज को इस तरह से नाराज़ देखकर गुणवती ने पूछा- हे महाराज! आपके मन में ऐसी


क्या बात आई कि जो आप नाराज हो गए हैं? धर्मराज ने कहा- हे गुणवती ने सभी धर्म- कर्म किए और सभी देवताओं की आराधना व पूजा की है, पर मेरे लिए तुने कुछ भी नहीं किया। बस यही बात मेरे मन में आ रही है। हे गुणवती! तू ही बता कि यह सत्य है या नहीं? यह सुनकर गुणवती ने कहा-हे भगवन्! मैं आपकी भ या आराधना का ढंग नहीं जानती थी इसलिए नहीं कर सकी। अतः यदि आप मुझे फिर से जीवन दान दें और अपनी भक्ति का मार्ग बतलाने की कृपा करें तो मैं वह भी कर आऊँ। यह सुनकर धर्मराज बोले- हे गुणवती! मैं अपनी भक्ति तथा पूजा की विधि-विधान तुम्हें बतलाता हूँ।


 हे गुणवती! सूर्य उत्तरायण होने के समय मकर संक्रान्ति के पर्व से मेरी भक्ति अर्थात् कथा तथा पूजा शुरू की जाती है और अगली मकर संक्रान्ति के आने पर समाप्त की जाती है। इस बीच मेरी आराधना करने वाले प्राणी को प्रातः काल उठने के बाद नियमानुसार नहा-धोकर प्रेमपूर्वक मेरा भजन-पूजन या यथाशक्ति नाम जप करना चाहिए

श्री धर्मराज जी की


 और मेरी कथा कहकर या सुनकर भोजन ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार बिना नागा पूरे एक वर्ष तक मेरी कथा को कहना या सुनना चाहिए और जितना हो सके पुण्य और परोपकार करते रहना चाहिए।


 इस तरह एक वर्ष व्यतीत होने पर दूसरी मकर संक्रान्ति को मेरी स्वर्ण अथवा चाँदी की मूर्ति बनवाकर और उसे सुन्दर आसन पर स्थापित करके पंचामृत आदि से स्नान कराकर रोली, मौली, पान, पुष्प, सुपारी, केसर, कर्पूर, चन्दन आदि से पूजन करें तथा सफेद तिल के लड्डू बनाकर उनका भोग लगाना चाहिए और मेरी कथा कहकर या सुनकर यथा शक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान दक्षिणा देना चाहिए। मेरे साथ चित्रगुप्त जी की भी पूजा करनी चाहिए और उन्हें भी काले तिल के लड्डूओं का भोग लगाना चाहिए। दान में स्वर्ण या चाँदी की मूर्ति तथा मेरे द्वार पर सुविधापूर्वक चढ़ने के निमित्त चांदी या सोने की निसैनी, मोती या मोतियों के आभाव में भरी हुई चाँदी या बाँस की छाबड़ी, बाँस की छड़ी, छतरी,


१ एवं


 डोरी, खड़ाऊँ, पाँचों वस्त्र (पुरुष व स्त्रियों के अलग-अलग), चूड़ा, काजल, टीका, दर्पण तथा इनके अतिरिक्त जो भी बन सके एवं पंचपात्र, आसन, गऊमुखी, माला, थाली, कटोरी आदि चीजें सुपात्र व गरीब ब्राह्मण को भोजन कराकर देनी चाहिएँ। इसके सिवाए बन सके तो धर्मराज के निमित्त अश्व तथा कपिला गऊ और चित्रगुप्त जी के निमित्त काली गाय का दान करें तथा धर्मराज के निमित्त आसन, सिंहासन, आभूषण आदि भी दान करें। यदि सम्भव हो तो गऊ दान करने वाली गायों के सोने के सींग, चाँदी के खुर व ताँबे की पीठ बनाकर दान में दें। हे गुणवती ! यह विधान जो मैंने बताया है, जिनकी शक्ति इनसे अधिक दे सकने की हो, वे अधिक दें तथा जिनकी शक्ति कम हो वे यथाशक्ति दें। इस तरह कथा का विधान बतलाकर धर्मराज ने अपने दूतों से कहा- हे दूतों! इस गुणवती के प्राणों को वापिस मृत्युलोक में ले जाओ।


 उधर मृत्युलोक में गुणवती की मृत्यु के पश्चात् उसके सम्बन्धीजन अर्थी सजाकर उसे



10/


 प्रमशान में ले जाने की तैयारी कर रहे थे कि वह पुनः जीवित हो उठी। उसके इस तरह जीवितह जाने से सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ और दे उससे इसका कारण पूछने लगे तो गुणवती ने सबकी सारी कथा कह सुनाई और धर्मराज के व्रत की कथा का विधि-विधान भी वर्णन किया।


 इसके बाद गुणवती ने विधिपूर्वक एक वर्ष तक धर्मराज की कथा कहकर अन्त में धर्मराज का उत्साहपूर्वक पूजन करवाया एवं दान-पुण्य किया जिससे धर्मराज अति प्रसन्न हुए और गुणवती सानन्द स्वर्ग को प्राप्त हो गई।


 इतना कहकर सूतजी बोले- हे ऋषियों! जिस घर में स्त्रियाँ इस व्रत को धारण करती हैं और इस कथा को कहती हैं, उस घर में सभी प्राणी धर्मराज के दरबार में निर्भयता के साथ जाते हैं, उन्हें धर्मराज के दूत रास्ते में कुछ भी कष्ट नहीं देते तथा धर्मराज भी प्रेमपूर्वक उसका लेखा- जोखा लेते हैं तथा पापों के क्षय का उपाय भी बतला देते हैं।


 अतः जो भी इस कथा को विधिपूर्वक कहते



या सुनते हैं उन्हें मृत्यु काल में यमराज के दूर कष्ट नहीं पहुँचाते और उन्हें गरुड़ पुराण में बतलाए हुए धर्मराज की पुरी के मार्ग में जाने में भी कोई कष्ट नहीं होता। इस तरह वे प्राणी सहज ही में बैकुण्ठ को प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है।


 ॥ दोहा ॥


 धर्मराज की यह कथा, पढ़े सुने चित्त लाय दोनों लोक आनन्द मिले, सुख सम्पति बहु पाय॥


 ॥ छन्द ॥


 कथा विर्सजन होती है, अपने भीतर के पट खोल एक बार सब सुनने वाले, धर्मराज की जय बोलो


 ॥ बोलिए श्री धर्मराज महाराज की जय ॥













































































No comments:

Post a Comment

SEND FEEDBACK AND SUGGESTION FOR IMPROVEMENT

श्री गंगा जी की आरती

  श्री गंगाजी की आरती जय भगवती गंगे मां जय-जय भगवती गंगे।  तरल तरंगे दुर्मति भंगे सुरमति संगे ॥ जय ॥  विश्णु पदादनुसरणी खंडिनि ब्रह्मा...